
कोन/सोनभद्र(राकेश कुमार कन्नौजिया)_स्वच्छ भारत मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों को खुले में शौच से मुक्त बनाने के उद्देश्य से लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए सामुदायिक शौचालय आज कई ग्राम पंचायतों में बदहाली की मिसाल बन चुके हैं। विकासखंड कोन की ग्राम पंचायत पीपरखाड़ के टोला केवाल में बना सामुदायिक शौचालय इसकी सबसे बड़ी तस्वीर पेश कर रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले करीब पांच वर्षों से शौचालय की नियमित सफाई नहीं हुई, जिसके चलते वह पूरी तरह अनुपयोगी हो गया है। हाल ही में इसकी बदहाली का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो अधिकारियों ने केवल बाहर की साफ-सफाई कराकर खानापूर्ति कर दी, लेकिन अंदर की स्थिति आज भी बेहद दयनीय बनी हुई है।
ग्रामीणों के अनुसार शौचालय के अंदर चारों ओर गंदगी फैली हुई है। दरवाजे टूट चुके हैं, पानी की कोई व्यवस्था नहीं है, नल खराब पड़े हैं और शौचालय से दुर्गंध उठ रही है। ऐसी स्थिति में लोग इसका उपयोग करने से कतरा रहे हैं और खुले में शौच जाने को मजबूर हैं। इससे सरकार के स्वच्छता अभियान और करोड़ों रुपये की योजनाओं की जमीनी हकीकत सामने आ रही है।
सोमवार दोपहर बड़ी संख्या में ग्रामीण शौचालय के बाहर एकत्र हुए और प्रदर्शन कर प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सामुदायिक शौचालय के संचालन और रखरखाव के लिए सहायिका की नियुक्ति की गई है, जिसे प्रतिमाह लगभग ₹6 हजार मानदेय और ₹3 हजार रखरखाव मद के रूप में दिए जाने की बात कही जाती है। यदि नियमित भुगतान हो रहा है तो फिर शौचालय की यह बदहाल स्थिति आखिर किसकी लापरवाही का परिणाम है? ग्रामीणों ने पूरे मामले की वित्तीय जांच कराने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या केवल पीपरखाड़ तक सीमित नहीं है। विकासखंड कोन की कई ग्राम पंचायतों में बने सामुदायिक शौचालय या तो वर्षों से बंद पड़े हैं, या उन पर ताले लटके हैं, या फिर उनकी हालत इतनी खराब है कि उनका उपयोग करना संभव नहीं है। रामगढ़, बरवाखाड़, खेतकटवा सहित कई गांवों में बने शौचालयों की स्थिति भी चिंताजनक बताई जा रही है। कहीं सफाई नहीं होती, कहीं पानी की व्यवस्था नहीं है तो कहीं भवन जर्जर होकर टूटने की कगार पर पहुंच गया है। ऐसे में करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई सरकारी संपत्तियां धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होती जा रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ग्राम पंचायत स्तर से लेकर ब्लॉक और जिला स्तर तक निगरानी की व्यवस्था है, नियमित निरीक्षण के निर्देश हैं और रखरखाव के लिए बजट भी उपलब्ध कराया जाता है, तब आखिर इन सामुदायिक शौचालयों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या संबंधित ग्राम पंचायतों ने कभी इनकी समीक्षा की? क्या अधिकारियों ने मौके पर जाकर निरीक्षण किया? यदि नहीं, तो यह प्रशासनिक उदासीनता का गंभीर मामला है।
ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से मांग की है कि विकासखंड कोन के सभी सामुदायिक शौचालयों का विशेष अभियान चलाकर निरीक्षण कराया जाए, रखरखाव और मानदेय मद में हुए खर्च की जांच कराई जाए तथा दोषी अधिकारियों, कर्मचारियों और संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। साथ ही सभी शौचालयों को तत्काल चालू कर नियमित सफाई, पानी और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
पक्ष जानने का प्रयास
इस संबंध में जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ), खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) तथा सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक किसी भी अधिकारी ने फोन रिसीव नहीं किया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत बने इन सामुदायिक शौचालयों की बदहाली का जिम्मेदार आखिर कौन है? यदि समय रहते जिम्मेदारों की जवाबदेही तय नहीं की गई तो सरकारी धन की बर्बादी और ग्रामीणों की परेशानी दोनों लगातार बढ़ती रहेंगी। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन करने को बाध्य होंगे।









